
अजीत मिश्रा (खोजी)
भ्रष्टाचार की ‘डिजिटल’ सेंध: कप्तानगंज में शासनादेश दरकिनार, प्राइवेट दुकानों से सरकारी धन की ‘शॉपिंग’ कर रहीं सचिव रजनी दूबे!
- पंचायत सचिवालयों में कबाड़ हो रहे लाखों के कंप्यूटर, सहायकों के अधिकार छीन घर बैठे मोबाइल से हो रहा खेल।
- योगी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति को ठेंगा: आखिर क्यों मौन हैं ब्लॉक और जिले के जिम्मेदार अधिकारी?
- कप्तानगंज में लोकतंत्र शर्मसार: कंप्यूटरों पर जंग, सहायकों का शोषण और सचिव की ‘प्राइवेट सेटिंग’! पंचायत भवन नहीं, प्राइवेट दुकानों से संचालित हो रहा सरकारी खजाना!
- डिजिटल इंडिया को ठेंगा: रजनी दूबे के रसूख के आगे बौने हुए शासनादेश, आखिर कब गिरेगी गाज? सचिव के मोबाइल में कैद है फर्जी भुगतान का राज, जांच हुई तो खुलेगा बड़ा सिंडिकेट!
- ‘मनबढ़’ सचिव की मनमानी: पंचायत भवन में धूल, प्राइवेट दुकानों में ‘फूल’! साहब की सेटिंग, सरकार को रेटिंग: रजनी दूबे का ‘होम डिलीवरी’ भ्रष्टाचार!
- कबाड़ हुए कंप्यूटर, गायब हुई पारदर्शिता; कप्तानगंज में सचिव की अपनी समानांतर सरकार!
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
बस्ती/कप्तानगंज।उत्तर प्रदेश की ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाने और ‘डिजिटल इंडिया’ के सपने को धरातल पर उतारने के लिए सरकार ने करोड़ों का बजट खर्च कर पंचायत भवनों को हाईटेक किया। लेकिन बस्ती जिले के कप्तानगंज विकासखंड में तैनात सचिव रजनी दूबे ने इन तमाम सरकारी दावों और शासनादेशों को अपनी मनमानी के पैरों तले रौंद दिया है। सचिव पर आरोप है कि वे सरकारी धन का भुगतान पंचायत भवन के अधिकृत सिस्टम से करने के बजाय निजी दुकानों और अपनी सेटिंग वाली फर्मों से कर रही हैं।प्रदेश की योगी सरकार जहाँ एक ओर ग्राम पंचायतों को ‘डिजिटल’ बनाने और पारदर्शिता के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही है, वहीं कप्तानगंज विकासखंड में तैनात एक ‘मनबढ़’ सचिव ने सरकार की मंशा और शासनादेश, दोनों को ही बंधक बना लिया है। मामला सचिव रजनी दूबे से जुड़ा है, जिन पर आरोप है कि वे सरकारी धन का भुगतान पंचायत सचिवालयों में लगे कंप्यूटरों के बजाय मनचाही प्राइवेट दुकानों और चुनिंदा फर्मों के जरिए कर रही हैं।
लाखों का सिस्टम खा रहा जंग, कूड़ेदान बने पंचायत सचिवालय
शासनादेश के अनुसार, ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों का भुगतान पंचायत सचिवालय में लगे कंप्यूटर सिस्टम और वहां तैनात पंचायत सहायक के माध्यम से होना अनिवार्य है। सरकार ने इसके लिए इन्वर्टर, सोलर पैनल, कंप्यूटर और फर्नीचर जैसी सुविधाएं मुहैया कराई हैं। लेकिन कप्तानगंज की ग्राम पंचायतों में हकीकत इसके उलट है। सचिव रजनी दूबे की “मनबढ़ई” का आलम यह है कि पंचायत भवनों में लगे महंगे उपकरण रखरखाव के अभाव में कबाड़ हो रहे हैं। कंप्यूटरों पर धूल की परतें जमी हैं और वे महज शोपीस बनकर रह गए हैं, क्योंकि सारा वित्तीय लेनदेन सचिवालय के बाहर “प्राइवेट सिंडिकेट” के जरिए संचालित हो रहा है।हैरानी की बात यह है कि प्रत्येक ग्राम पंचायत में कंप्यूटर, इन्वर्टर, सोलर पैनल और पंचायत सहायकों की नियुक्ति इसलिए की गई थी ताकि सारा लेखा-जोखा और भुगतान वहीं से पारदर्शी तरीके से हो सके। लेकिन रजनी दूबे के कार्यक्षेत्र में सरकारी मशीनरी महज शोपीस बनकर रह गई है। पंचायत भवनों में लगे महंगे कंप्यूटर सिस्टम जंग खा रहे हैं और कूड़ेदान में तब्दील हो रहे हैं, क्योंकि साहब को ‘प्राइवेट सेटिंग्स’ में ज्यादा दिलचस्पी है।
अधिकारों का हनन: बेखबर पंचायत सहायक, बेखौफ सचिव
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, रजनी दूबे ने पंचायत सहायकों को उनके मूल कर्तव्यों से पूरी तरह बेदखल कर दिया है। पंचायत सहायकों को यह तक पता नहीं होता कि उनके गांव के विकास के लिए कितना बजट आया, कितना निकाला गया और किस मद में खर्च हुआ। यह न केवल वित्तीय अनियमितता है, बल्कि पंचायत सहायकों के अधिकारों का खुला हनन है।नियमों के मुताबिक, विकास कार्यों का भुगतान पंचायत सहायकों के माध्यम से होना अनिवार्य है, लेकिन यहाँ सचिव ने उनके अधिकारों को पूरी तरह से कुचल दिया है। पंचायत सहायकों को कानों-कान खबर तक नहीं होती कि पंचायत में कितना बजट आया, कितना खर्च हुआ और कहाँ गया। सूत्रों का दावा है कि सचिव रजनी दूबे न तो ब्लॉक मुख्यालय पर उपलब्ध रहती हैं और न ही ग्राम पंचायतों का रुख करती हैं। सारा खेल घर बैठे मोबाइल के जरिए संचालित हो रहा है, जहाँ से प्राइवेट दुकानदारों को विवरण भेजकर सरकारी खजाने में सेंध लगाई जा रही है।
घर बैठे ‘मोबाइल’ से चलता है ‘फर्जीवाड़े का बाजार’
चर्चा है कि सचिव न तो ब्लॉक मुख्यालय पर बैठती हैं और न ही ग्राम पंचायतों का निरीक्षण करती हैं। उनका पूरा कामकाज उनके मोबाइल और घर से चलता है। आरोप है कि मोबाइल के माध्यम से ही प्राइवेट दुकानदारों को भुगतान की डिटेल्स भेजी जाती हैं और मनचाही फर्मों पर धन हस्तांतरित कर ‘बंदरबांट’ की जाती है। यदि सचिव के मोबाइल और डिजिटल लॉग्स की गहन जांच की जाए, तो फर्जी भुगतान और कमीशनखोरी के एक बड़े खेल का पर्दाफाश हो सकता है।यदि सचिव रजनी दूबे के मोबाइल फोन और डिजिटल लेनदेन की निष्पक्ष जांच हो जाए, तो सरकारी धन के फर्जी भुगतान का एक बड़ा सिंडिकेट बेनकाब हो सकता है। भुगतान की आड़ में होने वाला यह ‘बंदरबांट’ जिले भर में चर्चा का विषय बना हुआ है।
जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
इतने बड़े पैमाने पर शासनादेश की धज्जियां उड़ने के बावजूद उच्चाधिकारियों की खामोशी कई सवाल खड़े करती है। क्या कप्तानगंज के प्रशासनिक अमले को इस मनमानी की जानकारी नहीं है? या फिर इस पूरे मामले में सचिव को किसी रसूखदार का अभयदान प्राप्त है?इतनी गंभीर अनियमितताओं और शासनादेश की धज्जियाँ उड़ाए जाने के बावजूद प्रशासनिक अधिकारियों की चुप्पी संदेह पैदा करती है। क्या सचिव को किसी रसूखदार का संरक्षण प्राप्त है? क्या भ्रष्टाचार की यह गंगा ऊपर तक बह रही है? जनता अब यह देखना चाहती है कि खबर प्रकाशित होने के बाद जिम्मेदार अधिकारी रजनी दूबे के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई करते हैं या फिर ‘जांच’ के नाम पर फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।
निष्कर्ष:
एक तरफ मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार पर लगाम कसने की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ रजनी दूबे जैसे कर्मचारी सरकारी धन को अपनी निजी जागीर समझकर लूट मचा रहे हैं। अब देखना यह है कि बस्ती जिला प्रशासन इस ‘मनबढ़’ सचिव पर कब तक कार्रवाई का चाबुक चलाता है या फिर भ्रष्टाचार की यह फाइल भी किसी रद्दी के ढेर में दबा दी जाएगी।
ब्यूरो रिपोर्ट: अजीत मिश्रा (खोजी)
डिवीजनल हेड – बस्ती मंडल
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